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शायद, वो लौट आया है ....







विवरणप्रस्तुत कविता में उसके आने का विवरण दिया गया है , वह एक ऐसा चित्रण है जिसका वर्णन - मात्र ही पाठकों के अंदर एक रहस्यपूर्ण कथा की उत्कंठा पैदा कर देगा, वह जो भी है पर समय और काल का उसपर वश नहीं ,वह मृत्यु के लिए स्वयं एक काल है, बाकी जानने के लिए कृपया इस कविता को पूरा पढ़ें और हाँ कमेंट सेक्शन में अपने विचार रखना न भूलें , धन्यवाद 

कविता

शायद, वो लौट आया है ....

एक ख़ौफ़ सा छाया है 

चारों ओर भय का सरमाया है 

न ही कोई चहल-पहल, बस हर तरफ़ माया है 

शायद, वो लौट आया है 


तेज़ आँधियाँ हैं चल रहीं 

बादल  की गरजें भी, उसके किस्से कह रहीं 

समुन्द्र भी है उथल-पुथल 

काल-चक्र में कैसी है, ये असमयिक हलचल 


पशु-पक्षी भी हैं भयभीत खड़े 

उसके इतिहास के साक्ष्य मौजूद पड़े 

कुसमय का क्यों फ़ैला है ये उफ़ान 

बदहाली, गरीबी, दुःख से दहक उठा है आसमान 


वक़्त की रफ़्तार, नियति की गति 

सभी हो चुकी हैं शिथिल 

आलम ऐसा, जैसे मरुस्थल में पड़ा 

कोई जीव मौत से कर रहा हो  तिलमिल 

शायद ये उसके 

अस्तित्व का प्रकोप है 

न कोई उजाला दिख रहा, न कोई अम्बर, 

बस खौफ ही खौफ है 


भयानक से भयानक ताकतें भी झुकीं 

सब की प्राणों की आहुति है रखी 

कोई नहीं जानता अब क्या होगा, ये कैसा कहर मचा 

नसीब ने ये कैसा खेल है रचा 


इतिहास में था तो कोई ऐसा, जिसने रोका था उसे

पर अब  रहा  ऐसा कोई, जो उसे ललकार भी  सके 

काल ने ओढ़ा एक कफ़न में लिपटा साया है

शायद, वो लौट आया है ....

      ©बिनीत कुमार झा | kavya_shaili



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